सलवा जुडूम का नंगा सच
“ मेरे पति को पुलिस वाले और एसपीओ घर से मारते हुए ले गए. जब मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे भी मारा. वे अपने बुटों, बंदूक के कुंदे से मेरे पति की छातियों पर वार करते रहे. फिर मेरे पति के सिर को चाकुओं से गोद-गोद कर उन्हें मार डाला.”
सलवा जुड़ूम के माटवाड़ा कैंप में रहने वाली आयते जब विस्तार से पुलिस और एसपीओ द्वारा अपने पति मड्डा मड़कामी की हत्या का वाकया सुनाती हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
उनका दावा है कि सब कुछ उनकी आंखों के सामने हुआ.
अपने दूधमुंहे बच्चे को संभालती हुई आयते बताती हैं कि 18 मार्च 2008 की शाम को पुलिसकर्मी पटेल, एसपीओ कोसा, फोटू 15-20 दूसरे पुलिसकर्मियों और एसपीओ के साथ माटवाड़ा राहत शिविर स्थित मेरे घर आए और उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे पति मड्डा मड़कामी को मारना शुरु किया. मैंने रोकने की कोशिश की तो मुझे भी मारा गया. उन्होंने माटवाड़ा कैंप में ही रहने वाले देवा मड़कामी, हिडमा मंडावी और सोमडू को भी पकड़ा और उन्हें लाठी और बंदूक के कुंदों से मारना शुरु किया.
आयते के अनुसार पुलिस वालों ने उसके पति मड्डा मड़कामी समेत देवा मड़कामी, हिडमा मंडावी और सोमडू के हाथ पीछे कर के उनकी ही लूंगी से बांध दिए और उन्हें पीटते हुए सड़क तक ले गए. सड़क पर उन्हें अधमरा होते तक मारा गया.
अपने हाथ और पीठ पर पिटाई के निशान दिखाती हुई उंगी कहती हैं-“ मैंने हाथ जोड़-जोड़ कर पुलिस वालों को कहा कि मेरे पति को लूला-लंगड़ा कर दो, भले उसकी आंखें निकाल लो पर उन्हें जिंदा छोड़ दो. लेकिन पुलिस वालों ने मेरी नहीं सुनी. मुझे भी आयते की तरह पीटा गया.”
बिज्जे के हिस्से में भी कुछ इसी तरह के दृश्य हैं, जिन्हें याद करते हुए उसकी आंखें भर जाती हैं.
मड्डा मड़कामी की पत्नी आयते कहती हैं-“ मेरे पति चिल्लाते रहे लेकिन पुलिस वाले उन्हें फुटबॉल की तरह अपने बूटों से उन्हें इधर से उधर उछालते रहे. कैंप में सब थे, सामने पुलिस चौकी के जवान भी. लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की. वे उन्हें बंदूक के कुंदों से मारते रहे. उनके सर पर चाकु रखकर उस पर पत्थरों से वार किया गया. हमने उनके पास जाने की कोशिश की तो पुलिस वाले अपने बंदूक के वोल्ट खट-खट-खट करते हुए कहते थे कि भाग जाओ नहीं तो तुम्हें गोली मार देंगे. रात गहराने के साथ मेरे पति की आवाज कम होती चली गई. हमें पता नहीं चल रहा था कि उनके साथ क्या हो रहा है. हम लोग डर कर कैंप में लौट गए.”
लेकिन अगली सुबह का सूरज उंगी, आयते और बिज्जे के लिए कोई उजाला ले कर नहीं आया था.
कैंप के दूसरे लोगों के साथ जब वे अपने-अपने पतियों की तलाश में निकलीं तो सड़क से उनके पतियों के घिसटने के निशान उन्हें मिले. इन निशानों और पंजों के निशान का पीछा करते हुए वे पास में ही बहने वाले नाले तक पहुंचे, जहां मड्डा मडकामी, देवा मडकामी और हिडमा मंडावी की चाकुओं से गुदी हुई लाश उन्हें मिली.
देवा मड़कामी के छोटे भाई बामन मड़कामी कहते हैं- “ 20 मार्च को मेरे भाई के अंतिम संस्कार से पहले एक थानेदार मड़कामी और एक डाक्टर आए. उन्होंने मुझसे एक कागज पर दस्तखत करवाया लेकिन मेरे भाई या मरने वाले दूसरे लोगों का पोस्टमार्टम नहीं किया गया. ”
अपने पतियों को खोने वाली आयते, उंगी और बिज्जे किसी भी क़ीमत पर अब लौट कर सलवा जुड़ूम कैंप में नहीं जाना चाहतीं. 2005 से ही सलवा जुड़ूम के माटवाड़ा राहत शिविर में रहने वाली तीनों कहती हैं- “हमें नक्सलियों का डर दिखा कर पुलिस वाले सलवा जुड़ूम कैंप में लाये और उन्होंने ही हमें कहीं का नहीं छोड़ा. उन्होने हमारे पति को मारा, अब हमें मार डालेंगे.”
देवा मड़कामी के भाई बामन मड़कामी चाहते हैं कि सलवा जुड़ूम बंद हो और कैंपों में रहने वाले लोगों को उनके गांव लौटने दिया जाए.
गांवों में तो नक्सलियों का आतंक है, क्या वहां लौटना खतरनाक नहीं होगा ? इस सवाल का जवाब देते हुए देवा कहते हैं- “ हमने नक्सलियों को कभी नहीं देखा. हमें तो पहली बार सलवा जुड़ूम ने ही नक्सलियों के बारे में बताया.”
बीमारी से ज़्यादा खतरनाक उसका ईलाज
पिछले डेढ़ दशक से दंतेवाड़ा में वनवासी चेतना आश्रम चलाने वाले हिमांशु कुमार कहते हैं- “ सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद से आदिवासियों के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे मैं विचलित हूं. ये कुछ इस तरह से है कि किसी को बुखार हो जाए और आप उसका ईलाज करने के बजाय एक दूसरी बड़ी समस्या पैदा करने वाला ईलाज शुरु कर दें. मसलन बुखार ठीक करने के लिए आप उसके शरीर को सलाखों से दागना शुरु कर दें. बस्तर में बीमारी से ज्यादा खतरनाक उसका ईलाज हो गया है.”
हिमांशु का कहना है कि बस्तर के आदिवासी नक्सलियों से इतना परेशान नहीं थे, जितना सलवा जुड़ूम ने उन पर कहर बरपाया है. आदिवासी समाज की जिंदगी में जो आस्था थी, जिंदगी को लेकर जो विश्वास था, उसकी धज्जियां उड़ा दी गईं.
वे दृढ़ता के साथ दुहराते हैं-“ सलवा जुड़ूम ने भविष्य के लिए ऐसे बीज बो दिए हैं, जिसके परिणाम हमें लंबे समय तक भुगतने पड़ेंगे.”
हम जांच करेंगे
बीजापुर के पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग ने इस मुद्दे पर जांच का आश्वासन दिया है. पुलिस अधीक्षक के अनुसार पहले इस मामले में नक्सलियों द्वारा तीनों आदिवासियों की हत्या की खबर सामने आई थी लेकिन परिजनों ने जांगला थाने के पुलिसकर्मियों और एसपीओ पर इनकी हत्या का आरोप लगाया है.
अंकित गर्ग के अनुसार इस मामले में जांच से पहले कुछ भी कह पाना मुश्किल है. उन्होंने बताया कि इस मामले की स्वतंत्र रुप से मजिस्ट्रियल जांच के लिए भी उन्होंने आवेदन दिया है.
और मैं बच गया
माटवाड़ा कैम्प में रहने वाले सोमडू की आंखों में मौत की दहशत कुछ इस तरह घर कर गई है कि वे कुछ भी बोलने से पहले इधर-उधर देखते हैं. कुछ इस तरह, जैसे उनके आसपास मौत टहल रही हो. फिर घृणा के साथ कहते हैं- “ वे कुत्तों की तरह आदिवासियों को मार रहे हैं.”
सोमडू माटवाड़ा कैम्प में रहने वाले उन 4 आदिवासियों में शामिल हैं, जिन्हें कैंप से उठा कर ले जाया गया और सबके सामने उन्हें अधमरा होने तक मारा गया. सोमडू के अनुसार उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वे ज़िंदा बचेंगे. उन्हें मारने वाले पुलिस वाले और एसपीओ भी उन्हें मरा हुआ मान चुके थे. सोमडू ने इसी गलतफहमी का फायदा उठाया और अंधेरा गहराने के बाद पुलिस और एसपीओ की नजरें बचा कर घिसटते हुए झाड़ियों में जा छुपे.
सोमड़ू से हमारी मुलाकात उस समय हुई, जब वे नहा रहे थे. पीठ पर जगह-जगह जख्मों के निशान दिखाते हुए वे कहते हैं- “ दो दिन तक तो मैं उठ ही नहीं पाया. मैंने जब देखा कि मेरे साथ कैंप में रहने वाले तीन लोगों की हत्या हो गई तो मैं बहुत डर गया. होली के एक दिन पहले मैं उठ कर अपने पुश्तैनी घर कटेकल्याण आ गया.”
कैंप में तो सैकड़ों लोग थे लेकिन आप चार लोगों को ही पुलिस ने क्यों निशाना बनाया ?
सोमडू पेशानी पर बल लाते हुए कहते हैं- “ हमें नहीं पता.लेकिन हमें मारते हुए वे कह रहे थे कि हमने रानीबोदली में लोगों को मारा है. कहां रानीबोदली और कहां माटवाड़ा...! हम दिन रात तो इनकी आंखों के सामने इनके घेरे में कैद रहते हैं.”
सरकार नक्सलियों द्वारा मारे जाने या घायल होने पर मुआवजा देती है, ईलाज कराती है. क्या उनके मामले में कोई सरकारी पहल हुई ? सोमडू पूछते हैं- “ पुलिस वालों ने ही तो तीनों लोगों की हत्या की और मुझे मारा. भला अब वे किसी को मुआवजा क्यों देंगे ? ”
अब आगे क्या ?
सोमडू इस सवाल पर चुप हो जाते हैं.
दुबारा पूछने पर आहिस्ता से कहते हैं- “ इस मामले में जो भी दोषी हैं, पुलिस वाला पटेल, एसपीओ कोसा, फोटू और दूसरे एसपीओ, इन सबको सजा मिलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो एसपीओ सबको मार डालेंगे.”
(एनएफआई मीडिया फेलोशीप के तहत किए जा रहे अध्ययन का हिस्सा)
अमन
आपकी बात सही है पर एसे शांत तो नही बैठ सकते , शुरुवात तो करनी पडेगी दोस्त तो देर किस बात की जो आपके मन में है वो कहिये आज नही तो कल सता के सियासत दानो को आपकी आवाज सुने दे जाएगी
जवाब देंहटाएंसच में वहां की हालत बहुत खराब है
जवाब देंहटाएंछत्तीसगढ के विचार मंच में आपक स्वागत, है अगर आपके कोई भी खबर या जानकारी है जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध छत्तीसगढ से है तो बस कह दीजिये हमें इंतजार है आपके सूचना या समाचारों का घन्यवाद
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